Shri Jagannath Rath Yatra

  • Date: Saturday, 14 July 2018
  • Event: Shri Jagannath Rath Yatra

 

विक्रम सम्वत् 2075 आषाढ़ शुक्ल द्वितीय                                                                                      14th July 2018

श्रीजगन्नाथ रथयात्रा 

 

पुरी की प्रसिद्ध जगन्नाथ यात्रा अपनी अद्भुत, चन्द्रछटा और मनोरमता के लिए जानी जाती है, जहाँ श्री भगवान जगन्नाथ जी बसते हैं। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की सुंदर मूर्तियों से सुसज्जित रथयात्रा आषाढ़ माह के मध्य में उड़ीसा (पुरी) के जगन्नाथ मंदिर से निकाली जाती है, इसी मनमोहक यात्रा को जगन्नाथ रथयात्रा के नाम से जाना जाता है।

इस जगन्नाथ यात्रा में सबसे आगे नीले वस्त्रों से सजे बलराम जी का रथ होता है, बीच में सुदर्शन चक्र के साथ काले वस्त्रों से सुसज्जित सुभद्रा जी का रथ होता है और सबसे पीछे पीले वस्त्र धारण किये भगवान जगन्नाथ जी का रथ चलता है। इस रथ यात्रा के दर्शन हेतु हजारों लाखों की संख्या में बच्चे, युवा और वृद्ध लोगों की टोलियां होती है। 

 

ऐसा माना जाता है कि सात दिनों तक भगवान जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा यहीं रहते हैं। तीनों रथ संध्या तक गुंडीचा मंदिर तक पहुंचते हैं और दूसरे दिन सुबह-सुबह तीनों मूर्तियों को रथ से उतार कर मंदिर में ले जाया जाता है। इन सात दिन तक भगवान जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा यहीं रहते हैं। इन सात पवित्र दिनों तक श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है और पूरे विधि-विधान से इन मूर्तियों की पूजा की जाती है। श्रद्धालुओं के दर्शन को "आइप दर्शन" कहते हैं।

इन तीनों मूर्तियों को आषाढ शुक्ल पक्ष दशमी के दिन फिर से रथों पर बैठाया जाता है और इसके बाद अपने मूल मंदिर में वापिस लाया जाता है इस वापसी यात्रा को "बाहुडा" के नाम से भी जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि जिन श्रद्धालुओं को रथयात्रा के दौरान रस्सी खींचने का मौका मिलता है, वे काफी सौभाग्यशाली होते हैं किन्तु जिन भक्तों को ये मौका नहीं मिला पाता है वे यदि इस रथ यात्रा का दर्शन मात्र कर लें तो उन्हें पुण्य प्राप्त होता है। 

इस रथयात्रा के पीछे मान्यता है कि एक बार देवी सुभद्रा अपनी ससुराल से द्वारिका आई थीं तो उन्होंने अपने दोनों भाइयों से नगर-दर्शन की इच्छा व्यक्त की। अपनी प्यारी बहन की इस इच्छा को पूरा करने के लिए दोनों भाइयों अर्थात् बलराम और श्रीकृष्ण ने उन्हें एक रथ पर बैठा कर नगर भ्रमण के कराया। तीनों अलग-अलग रथ पर सवार होकर नगर भ्रमण के लिए निकल पड़े, जिसमें देवी सुभद्रा का रथ बीच में था और दोनों ओर भाइयों के रथ थे। इसी के बाद से ही हर वर्ष रथयात्रा निकाली जाती है।

इस रथ यात्रा का उल्लेख शास्त्रों और पुराणों में भी मिलता है। स्कन्दपुराण में भी कहा गया है कि जो व्यक्ति रथ पर विराजमान श्री कृष्ण, बलराम और सुभद्रा देवी के दर्शन दक्षिण दिशा की ओर से आते हुए कर लेता हैं, उन्हें दर्शन मात्र से ही मोक्ष प्राप्त हो जाता है। 

 

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