जैन धर्मं में चातुर्मास का बहुत ही महत्व हैं |चातुर्मास चार महीने का होता हैं |यह समय जुलाई माह में प्रारंभ होता हैं और इसका समापन दीपावली के बाद होता हैं |चातुर्मास के दौरान वर्षा काल का समय भी आता हैं और वर्षाकाल में जीवो की उत्पत्ति होती हैं |जैन धर्म में जीवो की अराधना की जाती हैं इसीलिए जैन धर्म अहिंसा का सूचक हैं |बरसात में पानी भरने से जीवो की उत्पति होने के कारण आवागमन में बाधा होती हैं |जीवो की हिंसा न हो,इसीलिए जैन साधू चार महीने के लिए स्थायी हो जाते हैं |प्रलय होने के बाद छठा काल शुरू होता हैं तो पुनः धर्म की शुरुआत भादो शुदी पंचमी से पुनः धर्मं की शुरुआत हुई,इसीलिए उसमे दशलक्षण माह पर्व मनाया जाता हैं |चार महीने के लिए मुनिराज,साधू -साधवी ऐसा स्थान चुनते हैं,जहा धर्म की साधना हो सके |जैन साधू पैदल विहार करते हैं, गाडी या अन्य वाहन आदि का प्रयोग नहीं करते |चातुर्मास का समय अपनी आत्मा को धर्म रूपी गंगा से नहाने के लिए एक मात्र साधन हैं |
Dec 22 2011
जैन धर्मं में चातुर्मास का बहुत ही महत्व हैं |चातुर्मास चार महीने का होता हैं |यह समय जुलाई माह में प्रारंभ होता हैं और इसका समापन दीपावली के बाद होता हैं |चातुर्मास के दौरान वर्षा काल का समय भी आता हैं और वर्षाकाल में जीवो की उत्पत्ति होती हैं |जैन धर्म में जीवो की अराधना की जाती हैं इसीलिए जैन धर्म अहिंसा का सूचक हैं |बरसात में पानी भरने से जीवो की उत्पति होने के कारण आवागमन में बाधा होती हैं |जीवो की हिंसा न हो,इसीलिए जैन साधू चार महीने के लिए स्थायी हो जाते हैं |प्रलय होने के बाद छठा काल शुरू होता हैं तो पुनः धर्म की शुरुआत भादो शुदी पंचमी से पुनः धर्मं की शुरुआत हुई,इसीलिए उसमे दशलक्षण माह पर्व मनाया जाता हैं |चार महीने के लिए मुनिराज,साधू -साधवी ऐसा स्थान चुनते हैं,जहा धर्म की साधना हो सके |जैन साधू पैदल विहार करते हैं, गाडी या अन्य वाहन आदि का प्रयोग नहीं करते |चातुर्मास का समय अपनी आत्मा को धर्म रूपी गंगा से नहाने के लिए एक मात्र साधन हैं |
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