SRI DHARMA DEV JI

भारतीय संस्कृति-धर्म एवं सभ्यता के त्रिसंगम के समान परम श्रद्धेय स्वामी धर्मदेव जी ( महाराज श्री ) हमारी युग चेतना के सजग प्रहरी और धर्म परायण जीवन के प्रेरक दाता हैं। आपने समस्त भारत में श्रीमद् भागवत भागीरथी, मानस मंदाकिनी एवं अलकनंदा रूपी श्रीमद् देवी भागवत के माध्यम से कोटि-कोटि जन मानस को भगवद परायण जीवन जीने की प्रेरणा दी है।
पूज्य महाराज श्री आज अपनी अनूठी संगीतमय शैली, सारगर्भित भागवत विवेचना, मधुर वाणी द्वारा वर्तमान परिप्रेक्ष्य में कथाओं का भक्ति रसपान कराने में एक उत्कृष्ट स्थान रखते हैं।
हरियाणा की धरती की सन्तानों के लिए यह बड़े गौरव की बात है कि पूज्य महाराज श्री का जन्म जमदग्नि ऋषि की तपोभूमि, जीन्द के निकट ग्राम-जामनी में हुआ। स्नातकोत्तर (एम.ए.) तक की उच्च शिक्षा परिपूर्ण कर पूज्य महाराज श्री ने वि.स.2054 मकर संक्रान्ति के पावन पर्व पर सन्यास दीक्षा ग्रहण की।
महाराज ने ज्येष्ठ माह वि.स.2057 में पतित पावनी माँ भागीरथी के पावन तट पर स्थित श्री जयराम आश्रम, हरिद्वार से अपनी प्रथम भागवत कथा माँ गंगा के श्री चरणों में समर्पित कर भागवत कथा श्रृंखला का शुभारम्भ किया। वर्तमान में पूज्य महाराज श्री, श्री, विशुद्धानन्द आश्रम, हरिद्वार के पीठाधीश्वर हैं एवं महामण्डलेश्वर की उपाधि से विभूषित हैं। इस संस्था द्वारा लोक कल्याण हेतु अनेक सहकार्य सुचारु रुप से संचालित किए जा रहे हैं। निकट भविष्य में श्री धाम वृंदावन में भी एक सेवा प्रकल्प को पूज्य महाराज श्री मूर्तरुप प्रदान करने जा रहे हैं।
पूज्य महाराज श्री देश के सच्चे संतत्व के प्रतीक हैं, अभ्यास परायणता, चिन्तनशीलता एवं तपस्वी जीवन को धारण कर शब्द के माध्यम से शब्दातीत परमेश्वर की और उन्मुख करने वाली निर्मल एवं ओजस्वी वाणी द्वारा भारतीय संस्कृति की गंगा प्रवाहित करते हुए इस तपस्वी ने विश्व समस्त जनमानस के अंर्तमन में धर्म एवं आध्यात्म के कीर्ति मन्दिर निर्मित कर किये हैं ।
श्रीमद् भागवत कथामृत रुपी ज्ञान गंगा आम जन मानस तक पहुँचे, मानव आत्म कल्याण हेतु इसका श्रावण मनन एवं चिन्तन करें, अपने जीवन के प्रमुख उदेश्य को पहचाने इसी भागीरथ पुरुषार्थ में पूज्य ‘महाराजश्री’ निरन्तर प्रयासरत है और इसिलिए कहते है।
।। उतिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निवोधत् ।।
उठो जागो और श्रेष्ठ महापुरुषों द्वारा इस तत्व को जानो।


