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सती का योगाग्नि में आत्मदाह
 
Posted by: tniranjan
2012-02-17 04:50:47
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महेश्वर शिव और आदिशक्ति भगवती सती के विवाहोपरान्त, कैलास पर आनन्दपूर्वक रहते हुये बहुत समय बीत गया. कुछ काल पश्चात् सम्पूर्ण प्रजापतियों ने यज्ञ किया. उस यज्ञ में सभी बड़े-बड़े देवता, ऋषि, महर्षि आदि पधारे. भगवान शिव के श्वसुर प्रजापति दक्ष भी वहाँ पर आये. सभी ने खड़े होकर राजा दक्ष का स्वागत किया. केवल ब्रह्मा और शिव एक देवता होने के कारण अपने स्थान से नही उठे. दक्ष को भगवान शंकर के ऐसे व्यवहार से बहुत क्रोध आया. जिससे क्रोधित होकर उन्होंने भगवान शिव को बहुत अपमानित किया. जिसे सुन महादेव जी के गण नन्दीश्वर को भी क्रोध आ गया और विवाद इतना अधिक बढ़ गया कि उन सभी बातों से खिन्न होकर भगवान शिव अपने अनुचरों के साथ वहाँ से उठ कर कैलाश पर्वत चले गये.
एक समय भगवान शिव सती के साथ दण्डकारण्य से होकर गुजर रहे थे. वहाँ उन्होंने लक्ष्मण सहित भगवान राम को देखा जो रावण द्वारा छल पूर्वक हरी गई अपनी पत्नी सीता को ढूंढते हुये वन-वन भटक रहे थे. विरह में व्याकुल श्रीराम उच्च स्वर से - 'हा सीते! हा सीते!! ‘पुकारते हुये विलाप कर रहे थे. उस समय महादेव ने बड़ी श्रद्धा से नतमस्तक होकर उन्हें प्रणाम किया
परमेश्वर शिव की यह लीला देखकर उन्होंने भगवान शिव से पूछा- प्रभो! भक्त के समान इतना विनम्र होकर आप इन दोनों राजकुमारों को क्यों प्रणाम कर रहें हैं?
महेश्वर ने कहा- 'देवी! ये दोनों साधारण राजकुमार नही हैं. इनका प्राकट्य सूर्यवंश के महाप्रतापी राजा दशरथ के यहाँ हुआ है. ये दोनों साक्षात् भगवान विष्णु और शेष हैं. जो श्रीराम और लक्ष्मण के रुप में सृष्टि के कल्याण के लिये नर-लीला कर रहें हैं. ‘परन्तु शिव की माया से मोहित सती के मन में उनकी बातों पर विश्वास नही हुआ. भगवान शिव ने कहा- प्रिये!
कुछ काल पश्चात् ब्रह्मा जी ने दक्ष को सभी प्रजापतियों का स्वामी बना दिया। जिससे दक्ष का गर्व और भी बढ़ गया. उसने एक बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया। दक्ष ने उस यज्ञ में सभी देवर्षि, ब्रह्मर्षि, ब्रह्मनिष्ठ महापुरुषों, देवताओं आदि को निमन्त्रित किया. केवल शंकर जी को बुलावा नहीं भेजा गया। सभी देवताओं को उत्साह पूर्वक उस यज्ञ में जाते देख सती ने भगवान शंकर से पूछा प्रभो ! ये देवगण कहाँ जा रहे हैं?
महेश्वर शिव ने कहा- 'देवी ! तुम्हारे पिता दक्ष ने विशाल यज्ञ का आयोजन किया है. उसी में सम्मिलित होने के लिये ये समस्त देवगण जा रहे हैं. ऐसा माता पार्वती ने भी यज्ञ में सम्मिलित होने की इच्छा प्रकट की. दक्ष मेरे विशेष द्रोही हो गये हैं. इसीलिये उन्होंने हम दोनों को उस यज्ञ में नही बुलाया है. जो लोग बिना बुलाये किसी के घर जाते हैं. वे अपमान के भागी होते हैं और अपमान मृत्यु से भी बढ़कर कष्टदायक है. अतः हम दोनों को वहाँ कदापि नही जाना चाहिये.'
भगवान शंकर के बार-बार मना करने पर भी जब सती नही मानी, तब महेश्वर ने उन्हें अपने साठ हजार गणों के साथ दक्ष के यहाँ भेज दिया. यज्ञ में भगवान शिव का भाग न देखकर सती अत्यन्त क्रोधित हुई और अपने शरीर को उन्होंने वहीं योगाग्नि द्वारा जलाकर भस्म कर दिया. चारों ओर हाहाकार मच गया. रुद्रगण कुपित होकर यज्ञ को नष्ट-भ्रष्ट करने लगे. किसी तरह महर्षि भृगु ने रक्षोघ्न मंत्र से यज्ञ की रक्षा की.
Tages:- Lord shiva, mata parvati, sati, devi sati, raja daksh, daksh prajapati, yagya, lord ram, lakshman, sita, raja dashrath
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