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शिव हैं कोतवाल
 
Posted by:
2011-12-03 12:51:19
131 Views
Comments : 1
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मथुरा, हिन्दू धर्म को मानने वालों के लिए हमेशा से ही अति प्रिय एवं पवित्र दर्शनीय स्थल रहा है. श्री कृष्ण की जन्म स्थली होने के कारण हर हिन्दू यहाँ जाना अपना सौभाग्य समझता है. वैवस्तव मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु के अब तक ३३ अवतार हुए हैं, जिनमे से २८वे अवतार भगवान श्री कृष्ण के रूप में मथुरा में माँ देवकी और नन्द जी के पुत्र के रूप में पैदा हुए. प्राचीन भारत में, मथुरा सभ्यता का केंद्र रहा है. कला, संगीत, साहित्य, मूर्तिकला, स्थापत्यकला और धर्म दर्शन का अनोखा मिश्रण है मथुरा नगरी. मथुरा के चारो दिशाओ में भगवान शंकर के मंदिर है , जिस वजह से लोग भगवान शंकर को मथुरा का कोतवाल भी कहते हैं. यही वो जगह है जहाँ न केवल भगवान श्री कृष्ण अथवा विष्णु की पूजा जाता है, बल्कि यहाँ हर देवी देवताओं की पूजा आराधना बड़े श्रद्धा और विश्वास से की जाती है.
यहाँ हिन्दू धर्म में वर्णित सभी देवी देवताओं के मंदिर हैं. पवित्र स्थल मथुरा से महाकवि सूरदास, संगीताचार्य स्वामी हरिदास, कवि रसखान तथा स्वामी दयानंद के गुरु स्वामी विरजानंद आदि महान लोगों का नाम भी जुड़ा है. यही वो नगरी है जहाँ युगों बीत जाने के बाद भी यूँ प्रतीत होता है जैसे अभी-अभी यहाँ से श्री कृष्ण राधा गुजरे हैं, अभी अभी कृष्ण ने किसी गोपी की मटकी फोड़ दी और नाराज़ गोपियों के ताने जैसे हवा में विद्यमान है. यूँ लगता है की कृष्ण की अठखेलियाँ अब भी मथुरा के हृदय में ज्यों की त्यों हिलोरें ले रही है. मथुरा की आवो-हवा अब भी बड़ी मीठी, बड़ी पवित्र, बड़ी मधुर है. मथुरा की सजीवता और हर्षौल्लास की तुलना किसी और शहर से शायद ही की जा सके. यहाँ अनेको मंदिर और मठ है. यहाँ अनेकों ऋषि मुनियों ने वर्षो वर्षो तक तपस्या की और जीवन के गूढ़ रहस्यों को न सिर्फ समझा और जाना, अपितु जनसाधारण को ज्ञान का अथाह भंडार भी सौंप गए.
मथुरा की गाथा यूँ तो बहुत विस्तृत है, फिर भी कुछ बातें कालांतर में वर्णनीय हो गयी. यहाँ भगवान श्री कृष्ण के प्रपौत्र श्री व्रजभान द्वारा स्थापित "ध्रुव जी के चरणचिन्ह" हैं. कहतें हैं की यहाँ का अम्बरीश टीला असल में वही जगह जहाँ बैठकर राजा अम्बरीष ने घोर तप किया था और ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति की थी. यहीं है एक पवन स्थल जिसे नृसिंहगढ़ के नाम से जाना जाता है, जहाँ नरहरी नाम के महान तपस्वी ने वर्षो साधना की थी और ४०० वर्षो की आयु में स्वेक्षा से शारीर त्यागकर ब्रह्म में समा गए थे. प्रत्येक एकादशी और अक्षय नवमी को मथुरा की परिक्रमा की जाती है जिसे २१ कोसी या ३ वन की परिक्रमा भी कहतें है. वैशाख शुक्ल पक्ष की रात्रि में मथुरा की परिक्रमा का भी विधान है जिसे वनविहार की परिक्रम के नाम से भी जानते है. मान्यताएं और आस्थाएं कहती है की मथुरा की परिक्रमा करने से पुरे ब्रह्माण्ड की परिक्रमा के बराबर पुण्य प्राप्त होता है साथ ही परिक्रमा करते वक़्त मांगी हुई दुआएं भी पूरी होती है.
Tages:- Hindu dharma, Mathura, Krishna, radha, radha Krishna, swami haridas, lord shiva, raskhan
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1 Comments
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 Posted by: anjalisen 2011-12-08 01:40:14

 
nice one!!!!!!!!!!
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