कोसांबी में कपिल नाम का एक ब्राह्मण था. पिता उसका राजपुराहित था. वह मर गया तो बेटे के अनपढ़ होने से राजा ने दूसरे ब्राह्मण को राजपुरोहित बना दिया.
इस बात से कपिल की माँ बड़ी दुखी हुई. यह देख कपिल ने पढ़ने की इच्छा प्रकट की. वह श्रावस्ती में अपने पिता के एक मित्र के पास पढ़ने गया. शालीभद्र नाम के सेठ के यहाँ उसके भोजन का प्रबन्ध हो गया.
शालीभद्र की एक दासी थी. वह रोज उसे खाना परोसती और खिलाती थी. धीरे-धीरे उस दासी से कपिल का प्रेम हो गया.
एक दिन दासी ने कपिल सेव कहा - '' इस प्रेम को स्थिर रखना चाहते हो तो धन पैदा करो.''
पर निरक्षर कपिल कहाँ से धन पैदा करे? एक दिन कोई उत्सव था. दासी ने कपिल से कहा-''सब सखियाँ नये-नये गहने-कपड़े पहन रही हैं. पर मेरे पास कुछ नही है. तुम यहाँ के राजा के पास क्यों नही चले जाते? वह रोज सवेरे दो मासा सोना उस याचक को देता है, जो सबसे पहले उसके पास पहुँचता है.''
कपिल को बात जँच गई. जल्दी उठने की चिन्ता में वह रातभर सो न सका. आधी रात को ही वह उठकर चल पड़ा. समझा की सवेरा हो गया है.
राजा के चौकीदार ने उसे चोर समझकर गिरफ़्तार कर लिया और सवेरे राजा के सामने पेश किया.
बेचारे कपिल ने आदि से अंत तक अपनी सारी कहानी कह सुनाई.
राजा को उसकी बातों पर विश्वास हो गया- बोलाः ''हे ब्राह्मण देवता ! तुम जो चाहे सो मांग लो. तुम जो मांगोगे सो मैं दूंगा''
राजा से कितना सोना मांगा जाये, यह सोचने के लिये वह राजा के बगीचे में चला गया. दो मासे से क्या होगा, चार मासा मांगू? पर चार मासे से भी क्या होगा? दस मांगू, सौ मांगू, हजार मांगू?
हजार मासे से भी क्या होगा? लाख मांगू, करोड़ मांगू? पर करोड़ से भी क्या मेरी संतुष्टी हो जायेगी?
तब राजा का पूरा राज्य ही क्यों न मांग लूं?
कपिल ने देखा कि यह तृष्णा तो कभी शान्त होने वाली नही चाहे करोड़ मासा सोना मिल जाये तब भी. चाहे पूरा राज्य मिल जाये तब भी. लोभ का तृष्णा का कही पार नही है.
छी..छी..छी..., मैं भी कितना मूर्ख हूँ. मुझे कुछ न चाहिये. मैं सब कुछ छोड़कर अपरिग्रही बनूँगा.
राजा के पास जाकर कपिल ने कह दिया- ''महाराज, तृष्णा-का कोई अंत नही. आप मुझे दो मासा सोना दें चाहे करोड़ मासा, अपना राज्य ही क्यों न दे दें, तृष्णा कभी शान्त होने वाली नही. मैं इस तृष्णा को ही छोडूंगा. मुझे कुछ नही चाहिये.
Tages:-
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