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तुलसी विवाह
 
Posted by: Vikasg21
2013-11-11 01:29:03
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कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की एकादशी को तुलसी विवाह का उत्सव मनाया जाता है। तुलसी के पौधे को पवित्र और पूजनीय माना गया है। तुलसी की नियमित पूजा से हमें सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। कार्तिक शुक्ल एकादशी पर तुलसी विवाह का विधिवत पूजन करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
भगवान विष्णु के स्वरुप शालिग्राम और माता तुलसी के मिलन का पर्व तुलसी विवाह हिन्दू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। इसे देवप्रबोधिनी एकादशी भी कहते हैं. देवप्रबोधिनी एकादशी के दिन मनाए जानेवाले इस मांगलिक प्रसंग के सुअवसर पर सनातन धर्मावलम्बी (हिन्दू) घर की साफ़-सफाई करते हैं और घर को रंगोली से सजाते हैं. शाम के समय तुलसी के पास गन्ने से मंडप बनाकर उसमें शालिग्राम की बटिया (मूर्ति) रखते हैं और फिर विधि-विधान से उनका विवाह करते हैं.

एकादशी व्रत महत्व :-
तुलसी विवाह के सुअवसर पर व्रत रखने का बड़ा ही महत्व है. भक्तों के अनुसार इस दिन श्रद्धापूर्वक और विधि-विधान से व्रत करने पर व्रती को पुण्य की प्राप्ति होती है.

तुलसी विवाह की पूजन विधि :-
तुलसी विवाह के दिन तुलसी के गमले को गेरु रंग आदि से सजाकर उसके चारों ओर गन्ने का मंडप बनाते हैं। उसके ऊपर ओढऩी या सुहाग की चुनरी ओढ़ाते हैं। तुलसी के गमले को साड़ी ओढ़ा कर तुलसी मॉं को चूड़ी पहनाते है, उनका श्रंगार करते हैं। श्री गणेश एंव शालिग्रामजी का विधिवत पूजन करते हैं। पूजा के समय तुलसी मंत्र (तुलस्यै नम:) का जाप करें। इसके बाद एक नारियल दक्षिणा के साथ टीका के रूप में रखें। भगवान शालिग्राम की मूर्ति का सिंहासन हाथ में लेकर तुलसीजी की सात परिक्रमा कराएं। आरती के पश्चात तुलसी विवाह पूर्ण किया जाता है।विवाह से संबंधित मंगल गीत भी गाए जाते हैं।

तुलसी विवाह कथा:-
धािर्मक कथानुसार - एक बार सृष्टि के कल्याण के उद्येश्य से भगवान विष्णु ने राजा जालंधर की पत्नी वृंदा के सतीत्व को भंग कर दिया. इस पर सती वृंदा ने उन्हें श्राप दे दिया और भगवान विष्णु पत्थर बन गए, जिस कारणवश प्रभु को शालिग्राम भी कहा जाता है भक्त भगवान विष्णु की पूजा शालिग्राम रूप में भी करते हैं. घरों में कथा-वार्ता (सत्य नारायण भगवान की कथा) के समय शालिग्राम कि बटिया रखने का नीयम है। इसी श्राप से मुक्ति पाने के लिए भगवान विष्णु को अपने शालिग्राम स्वरुप में तुलसी से विवाह करना पड़ा था और उसी समय से तुलसी विवाह का यह अनूठा पर्व प्रत्येक साल मनाया जाता है.

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