दो ऋषि शौनक और अभिप्रतारी भोजन के लिये बैठे. भोजन करने से पहले जैसे ही भगवान को भोग लगाने लगे कि एक ब्रह्मणचारी ने भिक्षा के लिये आवाज लगाई.
ऋषि बोले- इस समय यहाँ भोजन नही मिलेगा. ब्रह्मचारी टला नही- उसने ऋषियों से पूछा. आप लोग किस देवता के उपासक हैं और किस देवता को भोग लगा रहें हैं?
ऋषि बोले- 'वायु देवता के, प्राण देवता के'.
ब्रह्मचारी- यह भोजन आपने किसके लिये बनाया है?
ऋषि- उन्हीं वायु देवता के लिये.
ब्रह्मचारी- 'वायु देवता तो सर्वव्यापी हैं. सबके भीतर हैं. आपके भीतर भी हैं, मेरे भीतर भी. हैं न?
ऋषि - 'हैं तो'
ब्रह्मचारी- 'तो फ़िर आप मुझे भोजन देने से क्यों इनकार करते हैं? मुझे भोजन देने से इंकार करके क्या आप वायु देवता का अपमान नही कर रहे हैं? कैसे अचम्भे की बात है कि जिसके लिये यह अन्न है, उसे ही वह नही दिया गया'
ऋषि लोग लजा गये. उन्होंने बड़े आदर से ब्रह्मचारी को भोजन कराया.
इस भुवन में जिस तरह अग्नि है तो एक ही, पर भिन्न-भिन्न रुपवाली वस्तुओं के प्रति भिन्न-भिन्न रुपवाला हो जाता है, उसी तरह सब प्राणियों के भीतर रहने वाला एक ही परमात्मा उनके रुप के अनुरुप हो रहा है. वह उनके भीतर भी है, बाहर भी.
जिस तरह इस भुवन में वायु है तो एक ही, पर भिन्न-भिन्न रुपवाली वस्तुओं के प्रति भिन्न-भिन्न रुपवाला हो जाता है उसी तरह सब प्राणियों के भीतर रहने वाला परमात्मा है तो एक ही, पर प्राणियों के भिन्न-भिन्न रुपों के अनुरुप हो जाता है. वह उनके भीतर भी है बाहर भी.
जिस तरह सारे संसार का नेत्र होकर भी सूर्य में नेत्रों के बाहरी दोषों का कोई असर नही होता, उसी तरह सारे प्राणियों के भीतर रहने वाले एक ही परमात्मा पर संसार के दुख का असर नही होता.
वह एक परमात्मा सबको अपने वश में रखता है. वह एक से अनेक रुप रख लेता है. जो बुद्धिमान लोग उसे अपनी आत्मा के भीतर देखते हैं, उन्हीं को सदा टिकने वाला सुख मिलता है, दूसरों को नही.
जो आदमी अपनी आत्मा में ही सारे प्राणियों को देखता है और सारे प्राणियों में भी अपनी ही आत्मा को देखता है वह किसी से घृणा नही करता.
जिस ज्ञानी पुरुष के लिये सब प्राणी आत्मा के ही रुप हो जाते हैं, उसे सब जगह एक ही ब्रह्म दिखता है. उसे किसका मोह होगा, किसका शोक.
Tages:-
Sai, rishi, vayu devta, agni devta, bite, brilliant, lord, brahm, puja